Sunday, April 20, 2014

जो समाज अपने युवा पीढ़ी को ज़िन्दगी के बारे में बुनियादी फैसला लेने का इज़ाज़त तक नहीं देता, जहाँ परिवार में पुरानी पीढ़ी और पुरुषों का निरंकुश स्वच्छेदारी अधिनायाकत्व आज भी प्रभावी है , जिस समाज के मानस पर रुढियों-परम्पराओं की ओक्टोपसी जकड कायम है , वह समाज बुर्जुआ समाज के सभी अन्याय अनाचार को और बुर्जुआ राज्य के वर्चस्व को स्वीकारने के लिए अभिशप्त है | इसलिए ,कोई आश्चर्य नहीं है की संविधान और कानून की किताबों में व्यक्तिगत आजादी और जनवाद की दुहाई देने वाला राज्यसत्ता अपने तमाम प्रचार माध्यमों के जरिये धार्मिक जातिगत-रुढियों मान्यताओं , अंधविश्वासों और मध्ययुगीन मूल्यों का बढ़ावा देने का काम करती है , क्यूंकि इन्ही के माध्यम से वो जनसमुदाय के शासन के लिए एक किस्म की "स्वस्फूर्ति" हासिल करती है और एक भ्रम पैदा करती है की उनका प्रभुत्व जनता की सहमती से कायम है | जो समाज भविष्य के नागरिको को रुढियों के खिलाफ विद्रोह करने की इज़ाज़त नहीं देता , वह अपनी ग़ुलामी की बेड़ियों को खुद ही मज़बूत बनाने का काम करता है | इन्ही रुढियों परम्पराओं के एतहासिक कूड़े कचरे के ढेर से वह फ़ासिस्ट गिरोह खाद पानी पाते है जो मूलतःएक असाध्य संकटग्रस्त बुर्जुआ समाज के उपज होते है | "अतीत के गौरव " की वापसी का नारा देते हुए यह फ़ासिस्ट शक्तियां वस्तुतःपूँजी के निरंकुश सर्वसत्तावादी शासन का वकालत करती हैं और धार्मिक-जातिगत -नस्ली-लेंगिक रुढियों को मज़बूत बनाकर व्यवस्था की बुनियाद को मज़बूत करने में एक अहम् भूमिका निभाती हैं| 
- प्रेम,परंपरा और विद्रोह से

Monday, March 3, 2014

मैक्सिम गोर्की - वह लड़का

यह छोटी-सी कहानी सुनाना काफी कठिन होगा-इतनी सीधी-सादी है यह! जब मैं अभी छोटा ही था, तो गरमियों और वसन्त के दिनों में रविवार को, अपनी गली के बच्चों को इकट्ठा कर लेता था और उन्हें खेतों के पार, जंगल में ले जाता था। इन पंछियों की तरह चहकते, छोटे बच्चों के साथ दोस्तों की तरह रहना मुझे अच्छा लगता था।
बच्चों को भी नगर की धूल और भीड़ भरी गलियों से दूर जाना अच्छा लगता था। उनकी माँएँ उन्हें रोटियाँ दे देतीं, मैं कुछ मीठी गोलियाँ खरीद लेता, क्वास की एक बोतल भर लेता और फिर किसी गड़रिये की तरह भेड़ों के बेपरवाह मेमनों के पीछे-पीछे चलता जाता-शहर के बीच, खेतों के पार, हरे-भरे जंगल की ओर, जिसे वसन्त ने अपने सुन्दर वस्त्रों से सजा दिया होता।
आमतौर पर हम सुबह-सुबह ही शहर से बाहर निकल आते, जब कि चर्च की घण्टियाँ बज रही होतीं और बच्चों के कोमल पाँवों के जमीन पर पड़ने से धूल उठ रही होती। दोपहर के वक्त, जब दिन की गरमी अपने शिखर पर होती, तो खेलते-खेलते थककर, मेरे मित्र जंगल के एक कोने में इकट्ठे हो जाते। तब खाना खा लेने के बाद छोटे बच्चे घास पर ही सो जाते-झाड़ियों की छाँव में-जबकि बड़े बच्चे मेरे चारों ओर घिर आते और मुझे कोई कहानी सुनाने के लिए कहते। मैं कहानी सुनाने लगता और उसी तेजी से बतियाता, जिससे मेरे दोस्त और जवानी के काल्पनिक आत्मविश्वास तथा जिन्दगी के मामूली ज्ञान के हास्यास्पद गर्व के बावजूद मैं अक्सर अपने आपको विद्वानों से घिरा हुआ किसी बीस वर्षीय बच्चे-सा महसूस करता।
हमारे ऊपर अनन्त आकाश फैला है, सामने है जंगल की विविधता-एक जबरदस्त खामोशी में लिपटी हुई; हवा का कोई झोंका खड़खड़ाता हुआ पास से निकल जाता है, कोई फुसफुसाहट तेजी से गुजर जाती है, जंगल की सुवासित परछाइयाँ काँपती हैं और एक बार फिर एक अनुपम खामोशी आत्मा में भर जाती है।
आकाश के नील विस्तार में श्वेत बादल धीरे-धीरे तैर रहे हैं, सूरज की रोशनी से तपी धरती से देखने पर आसमान बेहद शीतल दिखता है और पिघलते हुए बादलों को देखकर बड़ा अजीब-सा लगता है।
और मेरे चारों ओर हैं ये छोटे-छोटे, प्यारे बच्चे, जिन्हें जिन्दगी के सभी गम और खुशियाँ जानने के लिए मैं बुला लाया हूँ।
वे थे मेरे अच्छे दिन-वे ही थीं असली दावतें, और जिन्दगी के अँधेरों से ग्रसित मेरी आत्मा, जो बच्चों के खयालों और अनुभूतियों की स्पष्ट विद्वत्ता में नहाकर तरो-ताजा हो उठती थी।
एक दिन जब बच्चों की भीड़ के साथ शहर से निकलकर मैं एक खेत में पहुँचा, तो हमें एक अजनबी मिला - एक छोटा-सा यहूदी - नंगे पाँव, फटी कमीज, काली भृकुटियाँ, दुबला शरीर और मेमने-से घुँघराले बाल। वह किसी वजह से दुखी था और लग रहा था कि वह अब तक रोता रहा है। उसकी बेजान काली आँखें सूजी हुईं और लाल थीं, जो उसके भूख से नीले पड़े चेहरे पर काफी तीखी लग रही थीं। बच्चों की भीड़ के बीच से होता हुआ, वह गली के बीचोंबीच रुक गया, उसने अपने पाँवों को सुबह की ठण्डी धूल में दृढ़ता से जमा दिया और सुघड़ चेहरे पर उसके काले ओठ भय से खुल गये - अगले क्षण, एक ही छलाँग में, वह फुटपाथ पर खड़ा था।
“उसे पकड़ लो!” सभी बच्चे एक साथ खुशी से चिल्ला उठे, “नन्हा यहूदी! नन्हे यहूदी को पकड़ लो!”
मुझे उम्मीद थी कि वह भाग खड़ा होगा। उसके दुबले, बड़ी आँखोंवाले चेहरे पर भय की मुद्रा अंकित थी। उसके ओठ काँप रहे थे। वह हँसी उड़ाने वालों की भीड़ के शोर के बीच खड़ा था। वह पाँव उठा-उठाकर अपने आपको जैसे ऊँचा बनाने को कोशिश कर रहा था। उसने अपने कन्धे राह की बाड़ पर टिका दिये थे और हाथों को पीठ के पीछे बाँध लिया था।
और तब अचानक वह बड़ी शान्त और साफ और तीखी आवाज में बोल उठा - “मैं तुम लोगों को एक खेल दिखाऊँ?”
पहले तो मैंने सोचा कि यह उसका आत्मरक्षा का कोई तरीका रहा होगा - बच्चे उसकी बात में रुचि लेने लगे और उससे दूर हट गये। केवल बड़ी उम्र के और अधिक जंगली किस्म के लड़के ही उसकी ओर शंका और अविश्वास से देखते रहे - हमारी गली के लड़के दूसरी गलियों के लड़कों से झगड़े हुए थे। उनका पक्का विश्वास था कि वे दूसरों से कहीं ज्यादा अच्छे हैं और वे दूसरों की योग्यता की ओर ध्यान देने को भी तैयार नहीं थे।
पर छोटे बच्चों के लिए यह मामला एकदम सीधा-सादा था।
“दिखाओ - जरूर दिखाओ!”
वह खूबसूरत, दुबला-पतला लड़का बाड़ से परे हट गया। उसने अपने छोटे-से शरीर को पीछे की ओर झुकाया। अपनी अँगुलियों से जमीन को छुआ और अपनी टाँगों को ऊपर की ओर उछालकर हाथों के बल खड़ा हो गया।
तब वह घूमने लगा, जैसे कोई लपट उसे झुलसा रही हो - वह अपनी बाँहों और टाँगों से खेल दिखाता रहा। उसकी कमीज और पैण्ट के छेदों में से उसके दुबले-पतले शरीर की भूरी खाल दिखाई दे रही थी - कन्धे, घुटने और कुहनियाँ तो बाहर निकले ही हुए थे। लगता था, अगर एक बार फिर झुका, तो ये पतली हड्डियाँ चटककर टूट जाएँगी। उसका पसीना चूने लगा था। पीठ पर से उसकी कमीज पूरी तरह भीग चुकी थी। हर खेल के बाद वह बच्चों की आँखों में, बनावटी, निर्जीव मुसकराहट लिये हुए, झाँककर देख लेता। उसकी चमक रहित काली आँखों का फैलना अच्छा नहीं लग रहा था - जैसे उनमें से पीड़ा झलक रही थी। वे अजीब ही ढंग से फड़फड़ाती थीं और उसकी नजर में एक ऐसा तनाव था, जो बच्चों की नजर में नहीं होता। बच्चे चिल्ला-चिल्लाकर उसे उत्साहित कर रहे थे। कई-एक तो उसकी नकल करने लगे थे।
लेकिन अचानक ये मनोरंजक क्षण खत्म हो गये। लड़का अपनी कलाबाजी छोड़कर खड़ा हो गया और किसी अनुभवी कलाकार की-सी नजर से बच्चों की ओर देखने लगा। अपना दुबला-सा हाथ आगे फैलाकर वह बोला, “अब मुझे कुछ दो!”
वे सब खामोश थे। किसी ने पूछा, “पैसे?”
“हाँ,” लड़के ने कहा।
“यह अच्छी रही! पैसे के लिए ही करना था, तो हम भी ऐसा कर सकते थे...”
लड़के हँसते हुए और गालियाँ बकते हुए खेतों की ओर दौड़ने लगे। दरअसल उनमें से किसी के पास पैसे थे भी नहीं और मेरे पास केवल सात कोपेक थे। मैंने दो सिक्के उसकी धूल भरी हथेली पर रख दिये। लड़के ने उन्हें अपनी अँगुली से छुआ और मुसकराते हुए बोला, “धन्यवाद!”
वह जाने को मुड़ा, तो मैंने देखा कि उसकी कमीज की पीठ पर काले-काले धब्बे पड़े हुए थे।
“रुको, वह क्या है?”
वह रुका, मुड़ा, उसने मेरी ओर ध्यान से देखा और बड़ी शान्त आवाज में मुस्कराते हुए बोला, “वह, पीठ पर? ईस्टर के मौके पर एक मेले में ट्रपीज करते हुए हम गिर पड़े थे - पिता अभी तक चारपाई पर पड़े हैं, पर मैं बिलकुल ठीक हूँ।”
मैंने कमीज उठाकर देखा - पीठ की खाल पर, बायें कन्धे से लेकर जाँघ तक, एक काला जख़्म का निशान फैला हुआ था, जिस पर मोटी, सख्त पपड़ी जम चुकी थी। अब खेल दिखाते समय पपड़ी फट गयी थी और वहाँ से गहरा लाल खून निकल आया था।
“अब दर्द नहीं होता,'' उसने मुस्कराते हुए कहा, ''अब दर्द नहीं होता... बस, खुजली होती है...”
और बड़ी बहादुरी से, जैसे कोई हीरो ही कर सकता है, उसने मेरी आँखों में झाँका और किसी बुजुर्ग की-सी गम्भीर आवाज में बोला, ''तुम क्या सोचते हो कि अभी मैं अपने लिए काम कर रहा था! कसम से-नहीं! मेरे पिता... हमारे पास एक पैसा तक नहीं है। और मेरे पिता बुरी तरह जख्मी हैं। इसलिए - एक को तो काम करना ही पड़ेगा, साथ ही... हम यहूदी हैं न! हर आदमी हम पर हँसता है... अच्छा अलविदा!”
वह मुस्कराते हुए, काफी खुश-खुश बात कर रहा था। और तब अपने घुँघराले बालोंवाले सिर को झटका देकर अभिवादन करते हुए वह चला गया - उन खुले दरवाजों वाले घरों के पार, जो अपनी काँच की मारक उदासीनता भरी आँखों से उसे घूर रहे थे।
ये बातें कितनी साधारण और सीधी हैं - हैं न? लेकिन अपने कठिनाई के दिनों में मैंने अक्सर उस लड़के के साहस को याद किया है - बड़ी कृतज्ञता से भर कर!

Tuesday, March 6, 2012

क्या जनसंख्या वास्तव में मूल कारण है ?

डॉ.अमृत

अनुवाद:- रुपिंदर
अक्सर अखबारों, चैनलों, बौधिक हलकों और आम लोगों में बात चीत के दौरान इस बात पर जोर दिया जाता है कि दुनिया में ख़ास कर भारत में बढ़ रही भूखमरी, गरीबी, रहन बसेरों की कमी और बेरोज़गारी का कारण आबादी में हो रही लगातार बढौतरी है । कुछ विद्वानों को तो हर मुश्किल, हर संकट यहाँ तक कि आर्थिक मंदी के पीछे भी बढ़ रही आबादी ही नजर आती है । आओ देखें इन फिकरों और तर्कों में कितनी हकीक़त है ?
अन्न की कमी और इस के नतीजे से फैलने वाली भूखमरी के पीछे बेलगाम आबादी की वृद्धि ही मुख्य कारण बताने वाले सिद्धांत का असल निर्माता है थामस मालथम जो कि अठारवीं सदी का एक अंग्रेज पादरी था । उस समय इंग्लैंड में पूंजीवादी विकास के कारण आबादी में एकदम वृद्धि हुई और चारों तरफ ग़रीबी, भूखमरी, महांमारी का दौर था । इस दौर में मालथम ने खोज की थी कि मनुष्यों की आबादी 1 , 2 , 4 , 8 , 16… की रफ्तार से भाव जिओमैटरिक प्रोग्रैशन में बढ़ती है जब की अन्न की पैदावार 1 , 2 , 3 , 4 , 5 ढंग से भाव अरिथमैटिक प्रोग्रैशन में । इसलिए भूखमरी का फैलना अटल है । वह इस खोज पर इतना विश्वास करते थे कि अपनी किताब ' ऐन ऐसे आन प्रिंसिपल्स आफ़ पापूलेशन' में उन्होंने आबादी कम करने के लिए लोगों को गैर - स्वास्थ्यप्रद तरीक़े से रखना और महामारियों को आवाहन देने की वकालत की | सब से ज़्यादा नाराज़ वह चिकित्सकों से था जो बीमार लोगों को बचा डालते थे । सन् 1834 में मालथम की मृत्यु से पश्चात उन का यह सिद्धांत आज भी दुनियेँ के बहुगिणती को लूटने वाला पूंजीपती जमात को खूब जमता है । बार-बार इस बात के शोशे छोड़े जाते हैं कि अन्न की कमी का असल कारण आबादी में वृद्धि है । अब भारत के सबंध में इस सिद्धांत को देखते हैं । सन् 1951 में भारत का आबादी लगभग 36 करोड़ थी जो वर्ष 2008 - 09 तक बढ़ कर 114 करोड़ हो गई है मतलब 3.16 गुणों वृद्धि । इन वर्षों के दौरान भारत में अनाज की पैदावार 5.1 करोड़ टन से बढ़ कर 22.90 करोड़ टन हो गई है मतलब कि 4.5 गुना वृद्धि । यह तथ्य रजिस्ट्रार जनरल आफ़ इण्डिया , इकनामिक सर्वे आफ़ इण्डिया में दर्ज है । इस तरह मालथम का यह अनुसंधान गलत साबित होता है । और तो और, मालथम के समय इंग्लैंड का आबादी 83 लाख थी जो आज 512 लाख है । अब इंग्लैंड में न वैसे भूखमरी है और न अन्न की कमी ।
क्या भारत में सचमुच ही अन्न की कमी है ? संतुलित भोजन के पैमाने के अनुसार औसत शारीरिक परिश्रम करने वाला बालिग पुरुष के लिए 520 ग्राम, औसत शारीरिक परिश्रम करने वाली बालिग महिला के लिए 440 ग्राम , 10 से 18 वर्ष के लड़के के लिए 420 ग्राम और लड़की के लिए 380 ग्राम प्रति दिन अनाज की जरूरत होती है । वर्ष 2008 - 09 के अनाज उत्पादन के आँकड़ों के हिसाब से भारत की प्रत्येक व्यक्ति को548 ग्राम अनाज प्रति दिन उपलब्ध करवाया जा सकता है । हालांकि भारत में अनाज की पैदावार बढ़ाई जा सकती है क्यूँकि भारत की कुल खेतीयोग भूमि के सिर्फ़ 50 फीसदी हिस्से को ही सिंचाई की सुविधा है,बाकी कृषि वर्षा सहारे है । इसके बावजूद बाढ़ और सूखे से होने वाली फ़सलों की तबाही अलग है, जिस को बहुत हद तक रोका जा सकता है पर पैदावार के मौजूदा स्तर के चलते अन्न की कोई कमी नहीं है ,जिस तरह सरकारों की ओर से हो - हल्ला मचाया जाता है ।
अकसर सरकारी टी. वी. चैनल पर चींटियों का झुण्ड दिखा कर लोगों को डराया जाता है कि अगर आबादी की वृद्धि ना रोकी गई तो लोगों को रहने का लिए स्थल नहीं मिलेगा और चींटियों का तरह रहना पड़ेगा । इस समय संसार का आबादी 6.5 अरब है । इतनी आबादी को रहने के लिए कितनी जगह का जरुरत होगी? अगर हम दुनिया के हर व्यक्ति को 1240 वर्ग फुट के हिसाब से चार - चार सदस्यों के परिवार को 5000वर्ग फुट ( अरबन असटेट की उच्च आमदन वर्ग के पलाट के भूखंडों (प्लाट) समान ) के पलाट बांटें तो पूरी दुनिया की आबादी भारत के दो सूबों महांराष्ट्र और मध्य प्रदेश ( क्षेत्रफल 8000 अरब वर्ग फुट ) में ही समा जाएगी क्यूँ कि भारत की आबादी दुनिया की आबादी का 17 फ़ीसदी हिस्सा है तो अनायास ही समझा जा सकता है कि कितना स्थल चाहए है | इस को और कम किया जा सकता है अगर घरों को कई मंज़िला बना दिया जाए । इसलिए रहने के लिए स्थल की कोई कमी नहीं लग रही । सन् 2001 का जनगणना के अनुसार भारत में 1.58 करोड़ घर खाली पड़े थे । इसके इलावा अगर उन घरों की गिनती करें जिन में छ - छ कमरों में दो - दो व्यक्ति ही रहते हैं ( अंबानी के 27 मंज़िले महलों जैसे पूंजीपतियों के'घर' इस से अलग है) तो आवास की भी कोई समस्या दिखलाई नहीं देती ।
फिर सवाल यह पैदा होता है कि मानव विकास के लिए अनाज और रहने के लिए योग्य स्थल के बावजूदऔर भी बहुत सुविधायों की जरूरत होती है । हिऊमन डिवैलपमैंट की 1998 की रिपोर्ट मुताबिक पूरी दुनिया की आबादी को बुनियादी सहूलतें जैसे बुनियादी शिक्षा, पीने के लिए साफ़ पानी, साफ़-सुथरा आस-पास,बुनियादी सेहत सहूलतें और जरुरत अनुसार पोषण, औरतों के लिए प्रजनन सम्बन्धी सेहत सहूलतें उपलबध करवाने पर आने वाला खर्च लगपग 40 अरब डालर है । यह रकम बड़ी लग सकती है पर क्या यह वाकई ही बहुत बड़ी है ? इसी रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में सुंदरतावर्धक सामग्री पर खर्च 8 अरब डॉलर , यूरोप में आइसक्रीम का खर्च 11 अरब डॉलर , अमेरिका - यूरोप में इतर का खर्च 12 अरब डॉलर , अमेरिका - यूरोप में पालतू जानवरों के खाने का खर्च 17 अरब डॉलर , यूरोप में सिगरेट का खर्च 50 अरब डॉलर , यूरोप में शराब पर खर्च 105 अरब डॉलर , दुनियेँ भर में नशों पर खर्च 400 अरब डॉलर , दुनियेँ भर में शस्त्रों पर फौजी खर्च ( 2009 ) - 1300 अरब डॉलर , आर्थिक मंदी से पश्चात पूंजीपती को दिये पैकेज - 700 अरब डॉलर है । हैरानी की बात यह है कि संपूर्ण खर्च सालाना है । भारत में सब को स्वास्थ्य और सेहत सुविधायें मुहैया करवाना कोई आसमान से तारे तोड़ने वाला बात नहीं है । ऐम. ऐफ. सी. के बुलेटिन में नरेंदर गुप्ता की प्रकाशत एक खोज रिपोर्ट से यह बात सामने आई है कि पूरे भारत के लोगों को संपूर्ण ज़रूरीदवाएँ निःशुल्क उपलब्ध करवाने के लिए 30,000 करोड़ रूपये की जरुरत है । बजट के अनुरूप भारत की2011 - 12 की घरेलू पैदावार 89 लाख करोड़ के क़रीब होने की उम्मीद है और इस बजट में सीधे-असीधे रूप में 5.12 लाख करोड़ रूपये की टैकस रियायतें पूंजीपतियों को दीं गई हैं पर इस केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य के लिए रखी राशि 26 करोड़ है जो पूरे बजट का महज़ 0.29 फ़ीसदी बनती है । अगर इसको दोगुन्ना कर दिया जाए तो बहुते लोगों को दवाइयाँ निःशुल्क मिल सकती हैं ।
एक बात और जो विचार करने योग्य है यह कि आबादी की वृद्धि का कारण जिस बहुते "चिंतक" लोगों के मस्तिष्कों में ढूँढ़ते हैं , वह भी आर्थिक हैं । यूरोपीय देशों में जगीरू उत्पादन सम्बन्धों का टूटने से जैसे ही वहां पूंजीवाद ने पैर जमाने शुरू किये , सब देशों की आबादी में एकदम वृद्धि हुई । यह वृद्धि सौ वर्ष से अधिक अन्तराल के पश्चात जा कर रुकी । अब अधिकतर यूरोपीय देशों की आबादी स्थिर है अथवा कम हो रही है, इस के साथ यह भी से जानने की जरुरत है कि आबादी में वृद्धि सिर्फ़ बच्चे पैदा होने से नहीं होती, बल्कि लोगों का कम मरना और औसत उम्र लंबी होने से भी होती है । अब जैसे भारत में आज़ादी समय औसत उम्र 46 वर्ष थी जो अब 70 वर्ष से ऊपर जा चुकी है । मृत्यु दर जो 30 प्रती हज़ार थी, अब 7प्रती हज़ार हो गई है । यह भी नहीं है कि जन्म दर कम नहीं हुई, जन्म दर भी कम हुई है, फ़र्क़ इतना है जन्म दर, मृत्यु दर के मुकाबले कम नहीं हुई । इस तरह देखा जाए तो आर्थिक विकास और इस से जुड़ा सांस्कृतिक विकास ही सब से बढ़िया 'गर्भ - निरोधक' है पर बहुगिणती का आर्थिक और सांस्कृतिक विकास साधनों के समान विभाजन से संभव है, जिस के बारे में कोई बात छेड़ना ज़रूरी नहीं समझा जाता । आबादी कम करने का मतलब सिर्फ़ गरीबों का आबादी कम करने से ही होता है । कितने फ़ीसदी घटाए -10 , 20 या फिर 30 फ़ीसदी । यूनाईटिड नेशनज युनिवर्सिटी - वाईडर ("N" - W945R) की अनुसंधान रिपोर्ट मुताबक भारत की उपर की 10 फ़ीसदी आबादी देश के कुल सम्पत्ति के 52 फ़ीसदी हिस्से पर काबिज़ है जब कि बाकी 90 फ़ीसदी आबादी के पास सिर्फ़ 48 फ़ीसदी सम्पत्ति ही है । इस को अगर और बारीकी से देखें तो उपर की 10 फ़ीसदी के एक फ़ीसदी के पास 16 फ़ीसदी, 5 फ़ीसदी के पास 21 फ़ीसदी और 10फ़ीसदी के पास 14 फ़ीसदी सम्पत्ति है। इसी तरह नीचे की 80 फ़ीसदी आबादी के सब से नीचे वाली 10फ़ीसदी के पास केवल 0.2 फ़ीसदी, उस से उपर वाली 20 फ़ीसदी के पास एक फ़ीसदी और 50 फ़ीसदी के पास 8 फ़ीसदी पूँजी है । इस तरह साफ़ है कि भारत की 90 फ़ीसदी आबादी भी ख़त्म अथवा कम कर दी जाए तो बाकी बची आबादी की अमीरी में कोई ख़ास वृद्धि नहीं होने वाली | हाँ आबादी कम करने का संजे गाँधी वाला नुस्खा ऊपर से लागू करना शुरू कर दें तो गुणातमक अंतर आएगा !
इस समय संसार की आबादी 6.5 अरब है । माहिरों के अनुसार वर्ष 2040 तक 7.6 अरब तक पहुँच जाएगी । चिंता का विषय यह है कि उस समय आबादी में बच्चों और युवकों का अनुपात आज के मुकाबले कहीं कम होगा । माहिर तो आबादी का असली संकट ही इस को मान रहे हैं क्यूँ कि किसी भी मानव समाज का सब से महत्वपूर्ण ताक़त है - बच्चे और युवक। यह संकट यूरोपीय देशों में तो आने शुरू भी हो गया है। कई यूरोपीय मुल्क अब लोगों को बच्चे पैदा करने का लिए उत्साहित कर रहे हैं। इस तरह स्पष्ट है कि जिन समस्याओं के लिए आबादी की वृद्धि को अपराधी ठहराया जाता है, असल में उनके पीछे आज का आर्थिक - राजनीतक ढाँचा जिम्मेदार है । जरुरत है इस ढाँचे को बदलने की, ना कि ग़रीबों को मसीही संदेश देने की अथवा जबरदस्ती नसबंदी जैसा नुसख़े सुझाने की और लोगों में आबादी के वृद्धि बारे में गलत धारणाओ का प्रसार करने की। असल जरुरत है समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक, परीक्षण और ईमानदारी से हर समस्या की तह तक जा कर जाँच - पड़ताल की विधि अपनाने की |



Sunday, March 4, 2012

क्या ईश्वर ने ब्रह्माण्ड की रचना की ? Stephen Hawkings




हमारे पास है पधार्थ और हमारे पास है उर्जा और ब्रह्माण्ड को बनाने के लिए जिस तीसरी चीज़ की जरूरत पड़ेगी वह है अंतरिक्ष...एक विशाल अंतरिक्ष! आप इसे सब कुछ कह सकते है अध्बूत ,खूबसूरत, हिंसक लेकिन इसे एक उपमा नही दिया जा सकता यह नहीं कहा जा सकता की यह तंग है हम जहाँ भी देखे हमें अंतरिक्ष नज़र आता है एक अंतहीन अंतरिक्ष चारों ओर फैला हूया ...बस इतना सिर चकरा देने के लिए काफी है |

तो फिर यह सारा पधार्थ ,ऊर्जा,अंतरिक्ष आया कहाँ से ?हमें बीसवी सदी तक इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था इसका जवाब एक व्यक्ति की अदभूत समझदारी से मिला |शायद धरती पे हूया सबसे अदभूत वैज्ञानिक -अल्बर्ट आइंस्टाइन |


आइन्स्टाइन ने बड़ी एक अजीब सी चीज़ देखी ब्रह्माण्ड को बनाने के लिए जो दो मुख्या चीज़ें चाहिए थी पधार्थ और ऊर्जा असल में वोह एक ही है | यह कहा जा सकता है की एक ही सिक्के के दो पहलु है इनके मशहूर सूत्र E=mc2 का मतलब है की पधार्थ को उर्जा और उर्जा को पधार्थ की तरह समझा जा सकता है इसलिए हमें ब्रह्माण्ड बनाने के लिए अब तीन चीजों की जगह दो चीजों की जरूरत है उर्जा और अंतरिक्ष तो फिर ये सारी उर्जा और अंतरिक्ष आया कहाँ से इसका जवाब वैज्ञानिकों की कई दशकों की लंबी खोजो के बाद मिला उर्जा और अंतरिक्ष एक घटना के बाद अपने आप पैदा हूए थे जिससे आज हम बिग बेंग के नाम से जानते है |

बिग बेंग के समय एक पूरा ब्रह्माण्ड उर्जा से भरपूर अस्तित्व में आया जिसका अपना अंतरिक्ष भी था

यह ऐसे फूल रहा था जैसे किसी गुब्बारे को फुलाया जा रहा हो|


तो फिर ये अंतरिक्ष और उर्जा आये कहाँ से ?

उर्जा से भरपूर ये पूरा ब्रह्मांड अंतरिक्ष का ये अदभूत विस्तार और इसमें मौजूद हर चीज़ क्या अचानक पैदा हो गयी? कुछ लोग मानते थे ये सब ईश्वर का ही पैदा किया गया था|

लेकिन विज्ञान कुछ और कहता है हम पधार्थ और ऊर्जा के उस फोर्मुले के पार जा सकते है जिसकी खोज आइन्स्टाइन ने की थी हम कुदरत के नियमों का इस्तेमाल ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को समझने के लिए कर सकते है |


बिग बेंग से जो सबसे बड़ा रहस्य जूडा हूया है वो यह की अंतरिक्ष और उर्जा का यह अदभूत विशाल अंतरिक्ष अचानक कैसे पैदा हो गया होगा इसका रहस्य ब्रह्माण्ड से बहुत ही अजीब तथ्य से जूडा हूया है|

भौतिकी के नियम नकारात्मक उर्जा नामक एक अस्तित्व की चीज़ की मांग करते है

इसे समझने के लिए एक छोटी से मिसाल देता हूँ कल्पना कीजिये एक आदमी एक सपाट मैदान में एक पहाड बनाना चाहता है यह पहाड ब्रह्माण्ड को दर्शायेगा | इस पहाड को बनाने के लिए वोह ज़मीन में एक गड्डा खोद रहा है और इस मिटटी से अपना पहाड बनाता है पर इस तरह वेह एक पहाड ही नहीं बना रहा वह एक गड्डा भी बना रहा है इसे हम पहाड का नकारात्मक रूप भी कह सकते है जो मिटटी अब तक गड्डे में थी अब पहाड बंद चुकी है ब्रह्मांड के शुरुआत में क्या हूया होगा इसके पीछे भी यही सिद्धांत काम करता है जब बिग बेंग ने बड़ी मात्र में सकारात्मक उर्जा पैदा की होगी उसने उतनी ही उर्जा में नकारात्मक उर्जा भी पैदा की होगी इस तरह से नकारात्मक और सकारात्मक बना के शून्य बनाते हैं हमेशा ...ये कुदरत का एक और नियम है

तो आज फिर वोह सारी नकारात्मक उर्जा कहाँ है ये हमारे कॉस्मिक के तत्व में है अंतरिक्ष में |

अंतरिक्ष अपने आप में नकारात्मक उर्जा का विशाल भंडार है इतना बड़ा भंडार की सारी चीज़े मिलकर शून्य बनाये| ब्रह्माण्ड के battery की तरह है जिसमें नकारत्मक ऊर्जा जमा होती रहती है|

अब जरा सकारत्मक रूप देखे हम जो पधार्थ और ऊर्ज ा आज देखते है वोह एक पहाड की तरह है

और इसी के पास बना गद्दा या नकारात्मक रुप असल में अंतरिक्ष के पास फैला हूया है|

तो क्या कोई सचमुच ईश्वर है इसका मतलब क्या है ?

इसका मतलब यह है की कोई अगर यह ब्रह्माण्ड शून्य ही है तो इसमें किसी ईश्वर की जरूरत नहीं है|



क्यूंकि हम जानते है की ब्रह्माण्ड के नकारत्मक और सकारात्मक रूप मिलाकर शून्य बनाते है तो बस हमें यह समझना है की क्या या मैं ये कहूँ की कौन है जिसने पहली बार इस प्रक्रिया को शुरू किया होगा |

ऐसा क्या हूया की अचानक ब्रह्माण्ड उभर आया होगा |

पहली नज़र में ये परेशानं कर देने वाली समस्या लगती है क्यूंकि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में चीज़ें अचानक प्रकट नही हो जाति |

क्या ऐसा हो सकता है हम चुटकी बजाये और कॉफी सामने आजये... उसे हमे दूसरी चीजो से मिलकर बनाना पड़ता है जैसे काफी पावडर, पानी , दूध,शक्कर लेकिन अब जरा काफी की इस कप के अंदर जाइये तो दूध के कणों से गुजरते हुए आप अटॉमिक (atomic)स्तर पर पहुंचे और फिर सब अटॉमिक स्तर पर पहुँच जाए तो आप एक ऐसी दुनिया में पहुँच सकते है जहाँ कुछ नहीं से कुछ प्रकट होना मुमकिन है भले ही थोड़ी समय के लिए ही ऐसा इसलिए क्यूंकि इस स्तर पर प्रोटोन जैसे कण कुदरत के नियमों के अनुसार बर्ताव करते है जिसे हम इसे (quantum mechanics) कुअनतम मेकानिक्स कहते है और वो सचमुच अचानक प्रकट हो सकते है थोड़ी देर तक रुक सकते है और फिर दोबारा गायब हो सकते है ताकि कहीं और प्रकट हो सके क्यूंकि हमे पता है की कभी ब्रहमांड बहुत छोटा था एक प्रोटोन से भी छोटा| इसका एक बड़ा ही असाधारण मतलब है... इसका मतलब अपने असीम और चक्र देने वाले विस्तार जटिलता के बावजूद ब्रह्माण्ड कुदरत के नियमों को तोड़े बिना अस्तित्व में आ गया होगा उस पल के बाद से बड़ी मात्र में उर्जा निकली और अंतरिक्ष में फ़ैल गया एक ऐसी जगह जहाँ सारी नकारत्मक उर्जा जमा हो सकती थी ताकि सबकुछ संतिलित हो सके |

आइन्स्टीन ने बताया है बिग बेंग के समय एक हैरत भरी घटना घटी होगी और वोह थी ” समय की शुरुआत” दिमाग चक्र देने वाले इस विचार को समझने के लिए इस बात पर विचार कीजिये

अंतरिश में एक ब्लैक होल तैर रहा है

एक आम ब्लैक होल ऐक बहुत विशाल तारा होता है जो अपने ही भीतर ढय जाता है ये इतना विशाल होता ही इसके गुरुत्व से प्रकाश भी बहार नहीं जा सकता इसलिए यह हमेश घना कला होता है इसका गुरुत्व छेत्र इतना ताकतवर होता है ना सिर्फ रौशनी बल्कि समय को भी अपने में खींच लेता है इसे समझने के लिए कल्पना कीजिये एक घडी ब्लैक होले की तरफ खींची जा रही है जैसे जैसे वोह उसके नज़दीक जायेगी समय धीरे होता जायेगा और अंत में रुक जायेगा वोह इसलिए नहीं रुकी क्यूंकि वोह बिगड गयी है वोह इसलिए रुकी क्यूंकि ब्लैक होले के अंदर समय का अस्तित्व ही नहीं है और ब्रह्माण्ड की शुरुवात में येही हूया होगा|

आप बिग बेंग से पहले के समय में नहीं पहुँच सकते क्यूंकि बिग बेंग से पहले कुछ नहीं था आख़िरकार हमने ऐसी चीज़ खोज ली है जिसका कोई कारण नहीं क्यूंकि तब समय था ही नहीं इसका मतलब यह है की ब्रहमांड का कोई रचनकार हो ही नहीं सकता क्यूंकि जब समय ही नहीं था तो फिर रचनाकार कैसे हो सकता है |

क्यूंकि खुद समय भी बिग बेंग के दौरान शुरू हूया था इसका मतलब यह ऐसी घटना थी जिसका कोई कारण कोई रचनाकार नहीं था |

हम सब मानने के लिए आज़ाद है की हम क्या चाहते है और येही वजह है की हमें आज यह समाज आ गया है की ईश्वर का अस्तित्व नहीं है ब्रह्माण्ड को किसी ने नहीं रचा और कोई हमारे भाग्य को न्रिधारित नहीं करता

इससे मुझे एक बड़ी अदभूत बात समझ आती है न ही तो कोई स्वर्ग है और ना ही कोई मौत के बाद का जीवन ब्रह्माण्ड के आकार को समझने के लिए हमारे पास एक ही जीवन है |


मौखिक से लिखित अनुवादक - अमित कोम्पनेरो

Sunday, February 12, 2012

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता

खाने की टेबुल पर जिनके
पकवानों की रेलमपेल
वे पाठ पढ़ाते हैं हमको
'सन्तोष करो, सन्तोष करो!'

उनके धन्‍धों की ख़ातिर
हम पेट काटकर टैक्स भरें
और नसीहत सुनते जायें --
'त्याग करो, भई त्याग करो!'


मोटी-मोटी तोंदों को जो
ठूँस-ठूँसकर भरे हुए
हम भूखों को सीख सिखाते --
'सपने देखो, धीर धरो!'

बेड़ा ग़र्क़ देश का करके
हमको शिक्षा देते हैं -
'तेरे बस की बात नहीं
हम राज करें, तुम राम भजो!'

Monday, January 9, 2012

Final Solution -




Shows the absolute brutality of conflict in India which recieves virtually no mainstream press in the United States

Monday, August 29, 2011

रौशनी


ऐ चाँद ऐ तारे कब तक इस शोषण भरी पूंजीवादी व्यवस्था को रौशनी देता रहेगा
अपने साथी सूरज को बोल जला दे इस व्यवस्था को और समाजवाद को कायम कर
उजाला दे और कायम कर शोषण मुक्त रौशनी

-अमित कोम्पनेरो