Sunday, April 20, 2014

जो समाज अपने युवा पीढ़ी को ज़िन्दगी के बारे में बुनियादी फैसला लेने का इज़ाज़त तक नहीं देता, जहाँ परिवार में पुरानी पीढ़ी और पुरुषों का निरंकुश स्वच्छेदारी अधिनायाकत्व आज भी प्रभावी है , जिस समाज के मानस पर रुढियों-परम्पराओं की ओक्टोपसी जकड कायम है , वह समाज बुर्जुआ समाज के सभी अन्याय अनाचार को और बुर्जुआ राज्य के वर्चस्व को स्वीकारने के लिए अभिशप्त है | इसलिए ,कोई आश्चर्य नहीं है की संविधान और कानून की किताबों में व्यक्तिगत आजादी और जनवाद की दुहाई देने वाला राज्यसत्ता अपने तमाम प्रचार माध्यमों के जरिये धार्मिक जातिगत-रुढियों मान्यताओं , अंधविश्वासों और मध्ययुगीन मूल्यों का बढ़ावा देने का काम करती है , क्यूंकि इन्ही के माध्यम से वो जनसमुदाय के शासन के लिए एक किस्म की "स्वस्फूर्ति" हासिल करती है और एक भ्रम पैदा करती है की उनका प्रभुत्व जनता की सहमती से कायम है | जो समाज भविष्य के नागरिको को रुढियों के खिलाफ विद्रोह करने की इज़ाज़त नहीं देता , वह अपनी ग़ुलामी की बेड़ियों को खुद ही मज़बूत बनाने का काम करता है | इन्ही रुढियों परम्पराओं के एतहासिक कूड़े कचरे के ढेर से वह फ़ासिस्ट गिरोह खाद पानी पाते है जो मूलतःएक असाध्य संकटग्रस्त बुर्जुआ समाज के उपज होते है | "अतीत के गौरव " की वापसी का नारा देते हुए यह फ़ासिस्ट शक्तियां वस्तुतःपूँजी के निरंकुश सर्वसत्तावादी शासन का वकालत करती हैं और धार्मिक-जातिगत -नस्ली-लेंगिक रुढियों को मज़बूत बनाकर व्यवस्था की बुनियाद को मज़बूत करने में एक अहम् भूमिका निभाती हैं| 
- प्रेम,परंपरा और विद्रोह से